सिम्बा (2018)
by
रोहित शेट्टी
रणवीर सिंह एक बहुत ही घटिया अभिनेता है । कभी वह नाक
से बोलते हुए बाजीराओ बल्लाड़ बन जाता है तो कभी उसमे बैंड बाजा बारात वाला बिट्टू प्रवेश कर जाता है । कभी सिंधी ,कभी जाट-मराठा-कोंकणी और कभी कभी तो वह अक्षय कुमार ही बन जाता है । गजब कन्फ़्यूज्ड
आदमी है । उसपर हाथ और सर बहुत हिलाता है ,बहुत ज्यादा यहाँ वहाँ
होता है और जितना ज़रूरत होती है हर काम उससे ज्यादा ही करता है । उसे देखकर मुझे ज़मीन
चक्कर पटाखे की याद आती है ।
हाँ लेकिन यह तो है कि उसमे कुछ है जो उसे प्रेमपात्र
बनाता है । अजय देवगन सिंघम के तौर पर बहुत शुष्क था । सिम्बा के तौर पर रणवीर बहुत
जोकराना है । वैसे भी रोहित शेट्टी समाज के कचरे हेतु कचरा फिल्में ही बनाता है । बस
सिम्बा थोड़ी ज्यादा ही बेकार फिल्म है । रणवीर के साथ साथ सारा अली खान भी वाहियात
है । उसका रोल ज्यादा बड़ा नहीं है पर करिश्मा नज़र नहीं आता ,न ही खूबसूरती । एक्टिंग कर लेती है ,पर स्टार मटिरियल
नज़र नहीं आती ।
एक अनाथ लड़का सबसे बड़ा चोर बनने हेतु पोलिसवाला बन जाता
है ।फिर बहुत भ्रष्टाचार भी फैलाता है । लेकिन एक मूहबोली बहन का रेप हो जाने पर उसकी
आत्मा जाग जाती है और वो रातों रात आदर्श इंस्पेक्टर बन जाता है । इस टाइप कि वाहियात
फिल्म है सिम्बा । कस्टोड़ी में हत्या ,फालतू का ईमोशनल चूतियापा
और बेवकूफना संवाद से लबरेज फिल्म है यह ।
आशुतोष राणा ने अच्छी भूमिका निभाई है । राणा और रणवीर
के कुछ सीन बढ़िया हैं । लेकिन मेलोड्रामा इतना अधिक है कि बहुत अझेल हो जाता है । अजय
देवगन आखिर में प्रविष्ट होता है और सिम्बा और सिंघम मिल कर फूहड़ और कचरा बात करते
हैं । अजब गजब फिलोसोफी है- कुछ पोलिसवालों को रेप करने वालों को ठोकते रहना चाहिए
ताकि लड़कियां महफूज रह सकें ।
160 मिनट कि यह लंबी फिल्म बर्दाश्त से बाहर है ।


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