दास देव 2018
द्वारा
सुधीर मिश्रा
शरत चन्द्र का
देवदास इतना रियल है की उसकी साइकॉलजी को समझना बहुत मुश्किल है । कोण किसके पीछे था
,क्यूँ और फॉर कब
किसका दिल टूटा और क्यूँ ,ये ठीक से कह पाना टेढ़ी खीर है । शायद
देवदास का दिल पारो ने तोड़ा और फिर उस कमजर्फ ने बदले में चन्द्रमुखी को दुत्कार दिया
। देवदास पारो से ,पारो देवदास से और चन्द्रमुखी देवदास से मोहब्बत
करते थे ,ऐसा जान पड़ता है । पर यह सही नहीं भी हो सकता ,क्यूंकी शरत बाबू ने शक की बहुत गुंजाइश छोड़ी है ।
खैर ओनुराग ने
देव डी बनाई ,और अब सुधीर ने दास देव बनाई है । दोनों ही पुनर्व्यख्याएं है । दास देव में
राहुल भट्ट ने देव का किरदार निभाया है । रिचा चड्ढा पारो और अदिति राव हैदरी चन्द्रमुखी
हैं । अनुराग कश्यप देव का बाप है जो सालों पहले एक हेलीकाप्टर ब्लास्ट में मारा जाता
है । 3-4 मिनट के इस रोल में अनुराग ने बहुत मज़ा दिया है । गजब की संवाद अदायेगी और
चेहरे पर टोटल हरामीपन। अनुराग शुड एक्ट मोर । उसके छोटे भाई के किरदार में सौरभ शुक्ल
है जिसने बेहतरीन काम किया है । वह इस फिल्म की जान हैं । सौरभ का भाई की हत्या में
हाथ है ,भाई की बेवा के साथ संबंध हैं पर फिर भी भाई के बेटे
,देव, की परवरिश और विरासत में कभी आड़े
नहीं बना ।
सौरभ,देव और उनकी राजनीति का विरोधी है
विपिन शर्मा जो की एक भरोसेमंद अभिनेता है । उसका भांजा बना है विनीत कुमार । दोनों
पारो उर्फ रिचा पर लट्टू हैं । देव से छिटककर जब पारो जमीन पर गिरती है तब मामा उसे
भकोस लेता है और भांजा देखता रेह जाता है । विनीत भी एक जोरदार एक्टर है । कुल मिलाकर
कहा जा सकता है की इस फिल्म में कद्दावर एक्टर इतने ज्यादा हैं की सबके साथ न्याय किया
जाना संभव ही नहीं था । सुधीर बाबू ने राजनैतिक प्रकरण इतना फैला दिया कि प्यार मोहब्बत
पर चर्चा बेमानी हो गई ।
प्यार हर तरफ है
। राहूल भट्ट रिचा को चाहता है ,अदिति राहुल को । विपिन और विनीत रिचा को । अदिति को तो सीएम खुद चाहते हैं
। लेकिन प्यार पर जमीन का अधिग्रहण भारी पद जाता है । किसानों कि जमीन के अधिग्रहण
के नाम पर बहुत फिल्में बन रही हैं,और बहुत राजनीति भी हो रही
है । ये एक यक्ष प्रश्न है । किसान से जमीन से कमाकर पेट तो भरा नहीं जाता ,हाँ हरजाने के तौर पर उसे सूरज और चंद्रमा चाहिए ।
खैर इस फिल्म कि
समस्या है बहुत बड़े और अच्छे अभिनेताओं का समागम । एक अच्छा अभिनेता एक फ्लेट कैरक्टर
को राउंड बना देता है । और बहुत सारे राउंड कैरक्टर एक दो घंटे कि फिल्म मे नहीं समा
सकते । इस चक्कर में दिलीप ताहिल,विनीत,दीपराज राणा आदि को फूटेज तो मिला है
लेकिन न्याय नहीं हुआ। राहुल भट्ट अभिनय तो बढ़िया करते हैं,जैसा
अगली में भी देखा था पर उनमे एनिमल फोर्स नहीं है । रिचा चड्ढा कि बात कि क्या खूब
है,जो करती हैं उसमे आग लगा देती हैं । अदिति एक वैश्या के तौर पे जँचती नहीं। कुल मिला कर इस फिल्म को सौरभ
शुक्ल नें प्राण दिये हैं । लेकिन फिर भी बात जमी नहीं ।


Comments
Post a Comment