Taskaree: A Smuggler's Web- Emraan Hashmi is the Saving Grace

TASKAREE 2025

by

Neeraj Pandey



अर्जुन मीणा जेम्स बॉन्ड की छठी औलाद है। कब कौन कहाँ किससे वसूली कर रहा है उसे सब पता है। वैसे भी शानपट्टी का दूसरा नाम है इमरान हाशमी। चूंकि शानपट्टी का पहला नाम कष्टम अधीक्षक है तो वह भी अर्जुन मीणा का ही हुआ। पहले द भांड ऑफ बॉलीवुड, फिर हक़ और अब अर्जुन मीणा, क्या खतरनाक पुनर्वतार लिया है चुम्मी भाई ने। रवींद्र गुज्जर शहीद होकर भगत सिंह हो गया। तस्करी में गुज्जर बना नंदीश संधु यूं भी भगत ही दिखता है, बस फेल्ट कैप की कमी रही। मिताली जरूरत से अधिक ड्रिवन है; उसका कराटे-कौशल ओलिम्पिक लेवल का है। संभव है स्पोर्ट्स कोटा की ही भरती हो। ये तीनों सूरमा कष्टम सुपरिन्टेंडेंट हैं, तीनों अपनी तथाकथित अनुशासनहीनता (पढ़िये ईमानदारी) के कारण फिलहाल सस्पेंडेड हैं और तीनों तीन ही सिंगल भी हैं। काम ही इतना रहता है, करें तो क्या करें? वैसे पहले एपिसोड में सस्पेंडेड मीणा ड्रग कूरियर को पचास लाख के एवज में निकल जाने देता है। तभी बहाली का फोन आता है और मीणा साहब पचास लाख रोकड़ा कॉमन पूल में जमा करवा देते हैं (और कहाँ कराएगा बे? ड्यूटी लेगा क्या ड्रग्स पर?) ।

खैर, बाद में अर्जुन एक कूरियर पर रीझ जाता है (अपना हाशमी है, यार! वैसे ये काम मरने वालों के हैं)। फिर उसे ही इनफ़ॉर्मर और अंडरकवर भी बना देता है। दुनिया ऐसे ही कष्टमवालों को परजीवी थोड़ी कहती है। गुज्जर की कहानी में ईमानदारी का तड़का है। उसका पूरा परिवार टेक्सेशन में है और महाभ्रष्ट है। भगत को घूसखोरी से कोफ्त है। सीधी भाषा में उसे बाप से बगावत ईमानदारी में दिखती है। गुज्जर को भी एयरपोर्ट पर ही प्यार मिल पाता है। हमारा क्रांतिकारी कोर्ट में प्रतीक्षा कर रहा है, अंगूठी और गवाह लिए, और मैडम हैं कि कैन्सल कर देती हैं। कारण- सर की आत्मनिचोड़ ईमानदारी! खैर नायक डिगता नहीं है, उल्टे अधिक कड़ा होकर सस्पेंड हो जाता है।

ऐसे में एंट्री होती है श्रीमान प्रकाश कुमार, सहायक आयुक्त की। सर्वोच्च सत्ता ने उन्हें स्मगलिङ्ग पर लगाम कसने के लिए भेजा है। शीर्ष सत्ता अगले चुनावों से पहले ‘भ्रष्टाचार से लोहा ले रहे हैं’ ऐसा नेरेटिव गढ़ना चाहती है। ऊपर का मुँहलगा प्रकाश आते ही सख्ती बढ़ा देता है। डाउटफुल कर्मचारियों का तबादला हो जाता है, या तो उनके पर कतर दिए जाते हैं। चीफ कमिश्नर साहब जिस ‘बड़े आदमी’ के प्रोटोकॉल के लिए बोलते हैं, प्रकाश और मीणा उसी को ठांस देते है। बड़े साहब भी पुराने खिलाड़ी हैं। वक्त की नजाकत समझते हैं। चार माह में रिटायरमेंट है। जाते-जाते संग्राम नहीं चाहते-न अपनों से, न तस्करों से (जिनसे पहले से ही सेटिंग है)। प्रकाश कुमार, सहायक आयुक्त सस्पेंडेड अफसरों की बहाली करवाकर मुंबई एयरपोर्ट की हवा एकदम टाइट कर देता है। परिंदा भी चोंच मारने की स्थिति में नहीं है।

उधर क्राइम सिंडीकेट का सरगना बड़ा चौधरी मिलान में जमा हुआ है और अल डेरा से रैकिट का संचालन करता है। सोना, ड्रग्स, बैग, मोबाइल उपकरण, घड़ियाँ सब धड़ाधड़ पकड़े जा रहे हैं। बड़ा चौधरी और उसके गुर्गे तिलमिलाकर धमकियों, हिंसा और हत्या पर उतर आते हैं। रण-भेरियाँ बज उठती हैं; सेनाएं लामबंद हो चुकी हैं। ऐसे में चीफ साहब एसी साहिबान को कॉन्फ्रेंस के लिए जबरन बैंकॉक भेज देते हैं जहां बड़ा चौधरी घात लगाकर उसका इंतज़ार कर रहा है। अंततोगत्वा दोनों शेरों में एक डील हो जाती है। “पहले ही कर लेते। इतना नुकसान क्यूँ करवाया?”, बड़ा पूछता है। “सही वैल्यूऐशन सेट करना था। मेरा बीस परसेंट रहेगा”, प्रकाश कुमार शानपट्टी झाड़ता है। यही उसे नहीं करना चाहिए था। शानपट्टी मीणा का यूएसपी है, उसी पर जँचता भी है।

त्रुटिपूर्ण इंटेल और हीरोवाली गटफीलिंग के भरोसे मीणा डिप्लोमेटिक कार्गो में दो टन स्वर्ण क्लीयर करते हुए एसी को रंगे हाथों पकड़ लेता है। ग्रूप बी, प्यार, दोस्ती, सोशल जस्टिस, ईमानदारी, देशभक्ति और चूतियापे की विजय होती है। ग्रूप ए और सिंडीकेट के दांत खट्टे हो जाते हैं। अर्जुन मीणा और रवींद्र गुज्जर का नामकरण टोकनमयी न होकर बहुत उत्साहवर्धक है। ऑस्कर नॉमिनी होमबाउंड के दोनों नायक भी पिछड़े वर्गों से हैं। हिन्दी कहानियों की विश्वसनीयता बचाए रखने के लिए उनके नायकों और खलनायकों को समाज का प्रतिनिधित्व करना ही चाहिए।

इमरान हाशमी और नंदीश ने बढ़िया काम किया है। एसी के रूप में अनुराग सिंह भी खूब फबे हैं। लग रहा है कि प्रकाश कोई यूपीससी क्वालीफाइड वर्ल्डबीटर सुपरअचीवर है। एक मेंटरिंग रील बनाते अथवा किसी कॉलेज में पेप टॉक देते दिखा देते तो नीरज पाण्डे के अगली बारहवीं फेल निर्देशित करने के आसार बढ़ जाते। गर्लफ्रेंड, परिचारिका, कूरियर और अंडरकवर के रोल में जोया फिरोज कमल के फूल सी सुंदर लगी हैं। डबल प्लेयर का रोल जमील खां ने बखूबी निभाया है। अस्सल विलेन बड़ा चौधरी बना है शरद केल्कर जो गहरे डबल बेस में बोलता है और शांत शारीरिक भाषा से भयाक्रांत करता है। उसके आसपास बहुत सारे दुर्जन इकट्ठा हैं, शायद इसलिए उसका पूर्ण प्रभाव महसूस नहीं होता। एक महातस्कर के अवतार में वह भोलेबाबा जान पड़ता है। वैसे तस्करी रिंग चलाने वाला मास्टरमाइंड बम-पटाखे-बंदूकें तो लहराता नहीं फिरेगा! आम दर्शक को इतना समझ नहीं आता।

मैं देख रहा हूँ कष्टम अफसरान इस सिरीज़ की जरूरत से ज्यादा ही भर्त्सना कर रहे हैं। इसे अविश्वसनीय और असटीक बताया जा रहा है, दूसरी स्पेशल छब्बीस या तीसरी बेबी मानने से इनकार किया जा रहा है। तो भाईलोग, यह डिपार्टमेंट-अधिकृत डॉक्यूड्रामा अथवा डॉक्यूमेंट्री तो है नहीं, और न ही अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में आपके अफसरों की गौरवगाथा बनाई गई है। ऐसे में बाज़ार जो कहानी बनाएगा और पात्र गढ़ेगा वे जनमत और व्यावसायिक आधार पर ही होंगे। जनता अधिकारियों और तंत्र के बारे में क्या सोचती है, सोशल मीडिया उठा कर देख लीजिए। खुरपेंच, खुरपात आदि हेंडल ऐसे ही लोकप्रिय थोड़ी हुए हैं। फिर भी मैं कहूँगा कि सिरीज़ ने कष्टम ड्यूटी, रेड-ग्रीन चेनल, स्क्रीनिंग मशीन, एआईयू, कोइन, डीआरआई, डोमेस्टिक क्रॉसओवर, और तस्करी के विभिन्न तारीखों और अपनाए जाने वाले हथकंडों पर बढ़िया जानकारी दी है। गोल्ड डस्ट, निगलने वाले ड्रग कैप्सूल, ब्रा और अटेची के तार, लेप्टोप-जूसर आदि  के पुर्जे एवं मलद्वार में ठूंस कर लाए जाने वाले स्वर्ण के बारे में बखूबी बताया गया है।

फिर रही बात अधिकारी प्रकाश कुमार की तो उसके पास से कोई रिकवरी नहीं हुई है, अतः मामला महंगे वकील पर आकर फँसेगा। डिपार्टमेंट सस्पेंड कर सकता है, चार्जशीट दे देगा, माहौल पूरा बनाएगा। अगर एसी सहीबान के पास मोटे पैसे होंगे तो बड़े वकीलों के दम पर कैट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही क्वेश करवा लेंगे, वरना बारह-पंद्रह साल तक डिपार्टमेन्ट खाल खींचता रहेगा। चीफ साहब चुपचाप रिटायर हो जाएंगे, ज्यादा उत्सव तो अब नहीं ही होगा। शायद बच्चों के पास रहने विदेश चले जाएंगे। कंसल्टेंसी खोलने का खतरा अब शायद न ही उठायें। जब तक हवाई पत्तन हैं, आवागमन है, और ड्यूटी डिफरेन्शियल है, तस्करी तो चलती रहेगी। नीरज पाण्डे ने क्रू और अधिकारियों को सही से लपेटा है; crpf, आप्रवासन और एयरलाइन कर्मचारियों पर भी थोड़ा-बहुत मसाला गिरा देते तो समग्र जानकारी उपलब्ध हो जाती। जाते-जाते कष्टम साथियों से इतना ही कहूँगा कि इतना ही बुरा लग रहा है मित्रों तो अपनी कहानियाँ आप कह लो (जैसे कोस्टाओ में कही), वरना ‘बदनाम हुए तो भी क्या बुरा है यारों, नाम तो हुआ ही’ से ही काम चलाओ।

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